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सौरभ पांडेय, शहडोल6 मिनट पहले

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मध्यप्रदेश में जिन आदिवासियों को मुद्दा बनाकर विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी की गई है। वहीं आदिवासी स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। मध्यप्रदेश के अंतिम छोर छत्तीसगढ़ की सीमा में रह रहे आदिवासी परिवारों को इलाज के लिए एक डॉक्टर भी नसीब नहीं है। सरकार ने अस्पताल के तौर पर बड़े-बड़े भवन तो बना दिए हैं, लेकिन वे बिना डॉक्टर के खंडहर हो रहे हैं।

दैनिक भास्कर की टीम शहडोल जिले के उसी जैतपुर विधानसभा क्षेत्र पहुंची। यहां 1 जुलाई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहुंचे थे। विधानसभा के एक छोर में पीएम मोदी ने जनजातीय समुदाय से संवाद किया था, तो दैनिक भास्कर की टीम विधानसभा के दूसरे छोर पहुंची। हम बात कर रहे हैं झींकबिजुरी की। यह एक आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र है।

बुढ़ार के बाद अगला सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र सीधे झींकबिजुरी में बनाया गया। इसे बनाने की मुख्य वजह सिर्फ यह थी कि अंतिम छोर में बसे आदिवासी परिवारों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा मिल सके। इतने बड़े अस्पताल की सौगात पाकर क्षेत्र का जनजातीय समुदाय बेहद खुश था। कुछ समय तक उन्हें अच्छा उपचार मिला।

कभी-कभार ही अस्पताल आते है डॉक्टर

अस्पताल में डॉक्टर भी तैनात हुए। समय के साथ सब बदलता गया। अब झींकबिजुरी का सामुदायिक अस्पताल बिना डॉक्टर के चल रहा है। सिर्फ 4 नर्स तैनात हैं जो मरीजों को देख रहीं हैं। जिला स्वास्थ्य विभाग ने वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर जैतपुर अस्पताल के डॉक्टर नीरज सिंह की तैनाती की है।

आदेश के मुताबिक, उन्हें हर सोमवार और गुरुवार को झींकबिजुरी अस्पताल आना है। ग्रामीण बताते हैं कि जैतपुर वाले डॉक्टर साहब कभी-कभार ही अस्पताल आ पाते हैं। बाकी टाइम सिर्फ नर्स ही अस्पताल में मरीजों को देखती हैं।

बिना डॉक्टर के पैदा हो गया बच्चा

झींकबिजुरी अस्पताल के प्रसूति वार्ड में सिर्फ एक महिला भर्ती थी। पड़ताल के दौरान महिला ने अपना नाम कौशिल्या गोंड़ निवासी कुटेला बताया। कौशिल्या ने झींकबिजुरी अस्पताल में अपनी तीसरी डिलीवरी बिना डॉक्टर के करवाई। इसके पहले दो डिलीवरी के समय डॉक्टर मौजूद रहते थे, जच्चा-बच्चा दोनों को देखते थे। इस बार जब वह तीसरी डिलीवरी के लिए आई तो अस्पताल खाली था। सिर्फ नर्स मौजूद थीं।

उन्होंने उसे भर्ती किया और किसी तरह बिना ऑपरेशन के बच्चा पैदा हुआ। डिलीवरी हुए दो दिन बीत गए उसे देखने कोई डॉक्टर तक नहीं आया। कौशिल्या के साथ उसकी मां मोहनीबाई निवासी मिरकान भी आईं। उन्होंने कहा कि बच्चा लगातार रो रहा है, लेकिन यहां कोई डॉक्टर ही नहीं। हमारे पास इतना पैसा भी नहीं है कि हम शहडोल जाकर इलाज करवा सकें।

वार्ड में खाली पड़े रहते हैं बिस्तर

सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में पदस्थ सफाई कर्मचारी रानी बताती हैं कि पिछले 2 महीने से अस्पताल पूरी तरह से खाली है। सभी वार्ड में लगे पलंग खाली रहते हैं। जो मरीज आते हैं वे यहां की स्थिति देखकर लौट जाते हैं। जब तक हमारे अस्पताल में डॉ. भूपेंद्र सिंह सेंगर सर थे तब तक यहां भीड़ लगी रहती थी। आपीडी हो या आईपीडी मरीज रहते थे। उनके जाते ही सब परेशान होने लगे हैं।

डॉक्टर सर पीजी करने मेडिकल कॉलेज चले गए। यहां के गरीब मरीज या तो स्थानीय झोलाछाप डॉक्टरों के पास जाते हैं या गंभीर होने पर शहडोल। अस्पताल में डॉक्टर नहीं होने मरीजों को बहुत परेशान होना पड़ रहा है।

सुरक्षाकर्मी ही काटते ही ओपीडी पर्ची

सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में कर्मचारियों की कमी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सुरक्षा के लिए तैनात कर्मचारी को ही ओपीडी पर्ची काटने की जिम्मेदारी दे दी गई है। कोई भी मरीज आता है तो सुरक्षाकर्मी उसकी ओपीडी पर्ची भरता है और ऑटोमैटिक ब्लड प्रेशर मशीन से उसका बीपी चेक करके पर्ची में लिखता है। दवाइयों के लिए नर्स के पास भेज देता है।

यह दस्तूर झींकबिजुरी अस्पताल में पिछले दो महीनों से लगातार चला आ रहा है। अस्पताल में कुल 5 नर्स हैं। 2 कर्मचारी लैब में हैं। 1 डेसर है। इसके बाद भी डॉक्टर नहीं होने से लोगों का विश्वास अस्पताल के प्रति कम हो गया है।

खाली कमरों में परिवार समेत रहते कर्मचारी

झींकबिजुरी अस्पताल में प्रसूति वार्ड के ठीक सामने आईसोलेशन रुम बनाया गया है। उसमें एक नर्स ने कब्जा कर रखा है। वह अपने पति के साथ उसी कमरे में रह रही है। दरवाजा खोलते ही सामने प्रसूति वार्ड है, जहां गर्भवती महिलाओं को भर्ती किया जाता है। इस अव्यवस्था से महिलाएं असहज होती हैं। पुरुषों के दखल से उनकी निजता भंग होती है। इसके बाद भी नर्स दबंगई से अस्पताल के कमरे में कब्जा करके रह रहीं हैं। ग्रामीणों का कहना है कि हम लोग विरोध तो करते हैं, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं है।

जनता के साथ पुलिस भी हो रही परेशान

सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में पोस्टमार्टम करने की व्यवस्था नहीं बनाई गई है। इस कारण यहां डॉक्टर के रहने के बाद भी पीएम नहीं हो पा रहे हैं। जबकि इसी झींकबिजुरी में सुरक्षा को देखते हुए एक पुलिस चौकी की स्थापना की गई है। इस चौकी के अंतर्गत 40 गांव की जनता आती है। अस्पताल से चौकी की दूरी लगभग 1 किलोमीटर है, लेकिन पुलिस को पीएम कराने जैतपुर या बुढ़ार जाना पड़ता है।

डॉक्टर पदस्थ नहीं होने के कारण सामान्य एमएलसी के लिए भी झींकबिजुरी पुलिस को जैतपुर अस्पताल के चक्कर काटने पड़ते हैं। वहीं जब डॉक्टर नहीं मिलते, तो पुलिस को लगभग 60 किलोमीटर दूर बुढ़ार अस्पताल आना पड़ता है।

सांसद आईं नहीं, विधायक काम कराती नहीं

झींकबिजुरी में रहने वाले रतन सिंह गोंड़ ने बताया कि हमारे यहां आज तक सांसद नहीं पहुंची हैं। विधायक आती हैं, लेकिन वह कोई काम नहीं करातीं। उनसे कुछ भी कहो तो कहती हैं कि बस हो जाएगा, कलेक्टर से बात की हूं, इससे बात की हूं, उससे बात की हूं, करतीं हैं और चली जाती हैं। सांसद को आना नहीं, विधायक को काम कराना नहीं। अब हम किसके पास जाएं।

अधिकारी कभी यहां आते नहीं। हमारे पास इतना पैसा नहीं कि हम अपनी समस्या और एक पूरा दिन लेकर शहडोल जाएं। गांव के ही रामबली गोंड़ बताते हैं कि हम लोग अब सिर्फ वोट बैंक रह गए हैं। हमारी समस्या से किसी को कोई लेना देना नहीं। अब इस सामुदायिक अस्पताल में एक डॉक्टर आ जाएं तो हमारी समस्या कुछ हद तक कम हो जाएगी।

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