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भोपाल44 मिनट पहले
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मध्यप्रदेश में बीजेपी सरकार रिपीट होगी या कांग्रेस की फिर से सत्ता में वापसी होगी? सियासी गलियारों में इसे लेकर कयासों और दावों के दौर जारी है। इस बीच कुछ कथित सर्वे भी सामने आए। जो इशारा कर रहे हैं कि बीजेपी का सत्ता में लौटना आसान नहीं है। ऐसे में वो अफसर अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं, जो सरकार के खास बने हुए हैं।
प्रदेश के मौजूदा सियासी हालात को भांपकर कुछ अफसरों ने दिल्ली जाने की तैयारी शुरू कर दी है। ये वो अफसर हैं, जिनकी गिनती सेकंड लाइन के ब्यूरोक्रेट्स में होती है। इनकी राय-मशविरा के बिना सरकार के फैसले नहीं होते।

सुना है कि मौजूदा सरकार के खास-म-खास होने के चलते कुछ अफसर इस बात से आशंकित है कि यदि सत्ता परिवर्तन हुआ तो उनका फ्यूचर खतरे में पड़ सकता है। लिहाजा अब ये डेप्यूटेशन पर दिल्ली जाने की तैयारी में जुटे हैं। इनमें कुछ ऐसे ब्यूरोक्रेट्स जोड़े से (पति-पत्नी दोनों) जाने की जुगत में है।
महुआ के बिजनेस में उलझे साहब

प्रदेश के एक बड़े पुलिस अधिकारी को साइड बिजनेस महंगा पड़ गया। उनका 3 करोड़ का इनवेस्टमेंट अटक गया है। अब साहब कशमकश है कि क्या करें क्या ना करें?
हुआ यूं कि ये अधिकारी जब विंध्य क्षेत्र में पोस्टेड थे, उस दौरान उन्हें पता चला कि यूरोपियन कंट्रीज में इंडियन महुआ की डिमांड है। फिर क्या था, साहब ने इलाके के तीन-चार बिजनेसमैन के साथ मिलकर महुआ एक्सपोर्ट की प्लानिंग बनाई। इनके भेजे सैंपल पास हो गए। महुआ एक्सपोर्ट किया। जिसमें अच्छा खासा मुनाफा हुआ।
साहब के मन में और कमाने की इच्छा जागी। उन्होंने करीब 3 करोड़ का महुआ और खरीद लिया, लेकिन यूरोपियन कंट्रीज ने अपनी डिमांड के मुताबिक महुआ खरीद कर नया माल लेना बंद कर दिया। ऐसे में साहब परेशान हो गए। तीन करोड़ रुपए खर्च कर खरीदा गया महुआ कोल्ड स्टोरेज में रखना पड़ा।
तीन करोड़ का इनवेस्टमेंट और ऊपर से कोल्ड स्टोरेज का किराया। साहब के लिए मुसीबत बन गया है। वे इस बात से परेशान है कि नए महुआ का सीजन आने वाला है और यूरोपियन कंट्री पुराना महुआ खरीदने को तैयार नहीं है। ये साहब अभी महाकौशल के एक शहर में पदस्थ हैं।
अरे, इनकी तो अफसरों से पटरी नहीं बैठ रही थी, इसलिए आए…
मध्यप्रदेश में पिछले कई महीनों से बीजेपी अध्यक्ष को बदले जाने की लेकर चर्चाएं जोर पकड़ती है और फिर शांत हो जाती है। नए कैप्टन के रूप में कई नाम उछलते हैं। कभी किसी ओबीसी चेहरे का, तो कभी किसी आदिवासी नेता का। कभी पुराने कैप्टन को फिर बुलाने की चर्चाएं उड़ती है। इस बार कुछ ऐसा हुआ कि लोग समझने लगे कि इस बार तो फैसला हो ही जाएगा। लेकिन…
हुआ यूं कि सूबे के एक बड़े आदिवासी नेता ने केंद्र की राजनीति से इस्तीफा दे दिया। इसकी खबर हफ्ते भर बाद बाहर आईं। इसी खबर के साथ एक बार फिर बदलाव की चर्चाएं चलने लगी। नेता जी को प्रदेश में बड़ी जिम्मेदारी मिलने, यहां तक कि डिप्टी सीएम बनाए जाने के कयास लगने लगे।
ये कयास तब धरे के धरे रह गए। जब ये पता चला कि नेता जी की केन्द्र में अफसरों से पटरी नहीं बैठ रही थी। लिहाजा उन्होंने इस्तीफा देकर सामाजिक क्षेत्र में काम करने की बात कही।
अपनों ने लगाई लंका…!

सत्ताधारी दल के एक युवा विधायक अपने भाइयों के चलते विवादों में घिर गए। आरोप लगे कि सरकारी प्रोजेक्ट के लिए रिजर्व जमीन पर विधायक के भाई कॉलोनी बना रहे हैं। इस पर विधायक ने विरोधियों को आरोप साबित करने का चैलेंज दे दिया। फिर क्या था, आरोप लगाने वाले ने तमाम दस्तावेज जुटा लिए। उन्होंने विधायक पर सत्ता का दुरुपयोग करने के आरोप लगाए और कार्रवाई की मांग कर डाली।
सुना है कि विधायक के दल के कुछ अपने ही विरोधियों तक पुख्ता प्रमाण पहुंचा रहे हैं। अब विधायक के करीबी कह रहे हैं कि हमारे नेता का सामने से मुकाबला नहीं कर पा रहे हैं इसलिए पीठ पीछे वार कर रहे हैं। बता दें कि विधायक बुंदेलखंड के एक जिले से आते हैं। वह 2018 में पहली बार चुनकर विधानसभा पहुंचे हैं।
और अंत में…
वीडियो से परेशान बीजेपी

मध्यप्रदेश में ‘सरकार’ ने हाल ही में ‘शिवराज-सुदामा’ संवाद कर पेशाब कांड पर डैमेज कंट्रोल की कोशिश की। इसके अगले दिन एक और वीडियो सामने आ गया। जिसमें सत्ताधारी दल के विधायक आदिवासियों को गाली देते दिख रहे हैं।
अब सत्ता से लेकर संगठन तक इस मामले में भी डैमेज कंट्रोल में जुटे हैं। हालांकि बीजेपी के लिए इस मामले में राहत की बात यह है कि विधायक भी आदिवासी वर्ग से ही आते हैं। नहीं तो इस मामले में भी बवाल मचना तय था।
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