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देवेंद्र मीणा/इंदौर17 मिनट पहले
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खाना बनाते समय अचानक आग लगने से मां चपेट में आ गई और हादसे में उनकी मौत हो गई। घटना के बाद पिता की मानसिक स्थिति गड़बड़ा गई और वे लापता हो गए। 12 साल बाद भी पिता का पता नहीं चल पाया है। तब बेटा 1 साल का था तब से अपनी बुआ के साथ ही रह रहा है। अब उसकी उम्र 14 साल हो गई और उसकी पढ़ाई पर संकट खड़ा हो गया है।
उसने राइट टू एजुकेशन (आरटीई) के जरिए 8वीं तक की पढ़ाई तो पूरी कर ली है लेकिन आगे की पढ़ाई के लिए स्कूल वाले फीस मांग रहे हैं, जबकि बुआ की स्थिति ऐसी नहीं है कि वो उसकी फीस भर सके। भतीजा मंगलवार को बुआ के साथ जनसुनवाई में पहुंचा और अधिकारियों से मदद की गुहार लगाई लेकिन उन्हें निराशा ही हाथ लगी है। जानिए क्या है पूरा मामला…
क्षेत्र के विधायक रमेश मेंदोला से भी मांगी मदद
जनसुनवाई के पहले परिवार मदद के लिए क्षेत्र के विधायक रमेश मेंदोला के पास भी गया था। परिवार इंदौर की विधानसभा-2 में ही रहता है। बुआ के आवेदन पर विधायक मेंदोला ने कलेक्टर को पत्र लिखक मदद देने की मांग की। मेंदोला ने बच्चे के लिए सरकारी योजना का लाभ दिलाए जाने की भी बात कही।

विधायक रमेश मेंदोला की चिट्ठी जिसे लेकर बुआ, भतीजे के साथ जनसुनवाई में पहुंची। आवेदन के साथ ये चिट्ठी भी लगाई गई। चिट्ठी में लिखा है कि वर्तमान में बच्चे ने आरटीई के माध्यम से इशाक पब्लिक स्कूल इंदौर से कक्षा 8वीं उत्तीर्ण की है और इसकी शिक्षा उक्त स्कूल में ही कक्षा 9वीं में कराना है। कृपया, इस बच्चे के माता-पिता नहीं होने के कारण शासन की योजना का लाभ दिलाने एवं संबंधित स्कूल को विशेष परिस्थितियों में नि:शुल्क शिक्षा प्रदान करने के लिए निर्देश प्रदान करने का कष्ट करें।
बुआ बोली – अधिकारियों ने कहा है कि सरकारी स्कूल में डाल दीजिए, कोई मदद नहीं मिली है
बुआ निशा (परिवर्तित नाम) ने बताया कि भतीजा एक साल का था, जब से मैं इसे रख रही हूं। साल 2011 में भोपाल में इसकी मम्मी घर में खाना बनाने के दौरान आग लगने से जल गई थी। मां की मौत के बाद बच्चे के पिता मानसिक रूप से डिस्टर्ब हो गए थे और वे तब से लापता हैं। फिर मैं भतीजे को भोपाल से इंदौर लेकर आ गई तब से ये हमारे साथ ही रहता है।
भतीजे की पढ़ाई की लिए जनसुनवाई में आई हूं। सीबीएसई इशाक पब्लिक स्कूल में आरटीई के तहत एडमिशन हुआ था। 8वीं तक की पढ़ाई पूरी हो गई है लेकिन अब स्कूल वाले फीस मांग रहे हैं। बस शुल्क सहित करीब 65 हजार रुपए सालाना फीस है। मेरे पति ऑटो रिक्शा चलाते हैं। तीन बेटियां है। घर का खर्च ही मुश्किल से चला पाते हैं, ऐसे में इसकी पढ़ाई का खर्चा कहां से निकालें।
ऐसे में भतीजे की फीस भर पाना संभव नहीं है। हम चाहते हैं कि जैसे ये अब तक पढ़ता आया है। वैसे ही उसकी आगे भी पढ़ाई जारी रहे। अधिकारियों ने कहा है कि सरकारी स्कूल में डाल दीजिए।
मेरी तीन बेटियां है। मैं घर-घर काम करती हूं। आर्थिक स्थिति खराब होने की वजह से बेटियां भी स्कूल नहीं जा पा रही है। लॉकडाउन की वजह से दो-तीन साल खराब हो गए।
हम शारदा नगर में रहते हैं। विधायक रमेश मेंदोलाजी के पास गए थे, उन्होंने यहां भेजा था। कहा था कि वहां मदद मिल जाएगी। हम तो बस यही चाहते हैं कि जिस स्कूल में अभी तक पढ़ता आया है, वैसे ही पढ़े। उसकी फीस माफ हो जाए और बच्चे का भविष्य अच्छा बन जाए।

बुआ निशा (परिवर्तित नाम) ने लगाई भतीजे की पढ़ाई के लिए मदद की गुहार।
आरटीई में 8वीं के बाद पढ़ाई का खर्च एक बड़ा सवाल
ये अपने आप में बड़ा सवाल है कि 8वीं तक तो आरटीई के तहत प्राइवेट स्कूलों में बच्चों को बेहतर एजुकेशन मिल जाता है लेकिन ये बच्चे 9वीं से 12वीं तक की निजी स्कूलों में कैसे पढ़ाई करेंगे इसकी कोई व्यवस्था नहीं है। स्टूडेंट्स या तो सरकारी स्कूलों में एडमिशन ले या फिर माता-पिता अपने खर्च पर बच्चों को प्राइवेट स्कूल में पढ़ाए, यही विकल्प उनके पास रह जाता है। कुछ संस्थाएं या प्रोफेशनल्स अपने स्तर पर बच्चों को पढ़ाई के लिए मदद करते हैं लेकिन उनकी भी अपनी लिमिट है और चयन का एक पैमाना है। सभी को उनकी तरफ से भी मदद मिल पाना संभव नहीं है।

जनसुनवाई के दौरान लाइन में अधिकारियों के सामने मदद के लिए भतीजे के साथ खड़ी बुआ।
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